यह कैसे हुआ
- 1851सिलाई मशीन का आविष्कारक लगातार बंद रहने वाली जिपर का पेटेंट कराता है। बात उत्पादन तक नहीं पहुंचती: वह किसी और काम में व्यस्त है।
- 1893नया संस्करण विश्व मेले में दिखाया जाता है। वह अटकता और खुल जाता है, इसलिए लगभग बिकता ही नहीं, कई सालों में करीब 20 ही बिकते हैं।
- 1913एक इंजीनियर इसकी बनावट बदलता है: कप और उभार वाले एक जैसे दांत भरोसेमंद ढंग से आपस में जुड़ते हैं। यही आधुनिक जिपर है।
- 1930 के दशकजिपर पुरुषों की पतलून पर पहुंचता है और फैशन समीक्षक इसे पसंद करते हैं। बड़े पैमाने पर इस्तेमाल तभी शुरू होता है।
दूसरा बिंदु पूरी देरी समझाता है। शुरुआती जिपर सबसे गलत वक्त पर खुल जाते थे, और ऐसी एक घटना ही किसी को उन्हें दोबारा कभी न इस्तेमाल करने के लिए काफी होती थी, क्योंकि किसी चीज की साख उसके विचार पर नहीं, उसकी भरोसेमंदी पर टिकी होती है।
तीसरा बिंदु दोबारा आविष्कार का नहीं, सुधार का था। सिद्धांत वही रहा, दांत का आकार और निर्माण की सटीकता बदल गई, और यह चीज एक कौतूहल से ऐसी वस्तु बन गई जिस पर भरोसा किया जा सकता था।
सबसे पहले किसने अपनाया
सबसे पहले इसे दर्जियों ने नहीं, बल्कि सेना और जूते बनाने वालों ने अपनाया। वे तेजी से बंद होने को महत्व देते थे और नई चीज से डरते नहीं थे, जबकि बड़े ऑर्डर ने उत्पादन को इतना बढ़ा दिया कि जिपर सस्ता हो गया और कपड़े बनाने वालों की इसमें दिलचस्पी जागी।
यह शब्द खुद जूते बनाने वाली एक कंपनी से आया, जिसने 1920 के दशक की शुरुआत में अपनी गैलोश का यही नाम रखा था। नाम उस आवाज का वर्णन करता था, और तकनीकी नाम के बजाय यही नाम दुनिया भर की भाषाओं में फैल गया।
कपड़ों में पतलून ने जिपर को सबसे देर से अपनाया। फैशन पत्रिकाओं ने इसे भूल गए बटनों की समस्या का हल बताया, जिससे मदद मिली, इसे फैलाने में किसी भी तकनीकी सुधार से ज्यादा काम विज्ञापन ने किया।
यह कहानी आविष्कारों के लिए बहुत आम है। काम करने वाले नमूने और रोजमर्रा की चीज के बीच प्रेरणा की चमक नहीं, बल्कि भरोसेमंदी, कीमत और किसी का पहला बड़ा ऑर्डर देने का जोखिम उठाने को तैयार होना आता है।
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स्रोत
- लगातार बंद रहने वाली जिपर के शुरुआती पेटेंट 19वीं सदी के मध्य के हैं
- एक जैसे दांतों वाली आधुनिक बनावट 1913 में बनाई गई, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल जूतों और सैन्य सामान से शुरू हुआ, और पुरुषों के कपड़ों में इसका इस्तेमाल 1930 के दशक में हुआ।