समझौता कैसे बिखरता है
- अचानक गोली चलना
- एहतियाती जवाब
- उल्लंघन का आरोप
- फिर लड़ाई
दूसरे कदम पर ध्यान दें। जवाब बुरी नीयत से नहीं, सावधानी के कारण दिया जाता है: अगर दूसरी ओर से शुरुआत हो गई है, तो इंतज़ार नहीं किया जा सकता। दोनों पक्ष एक ही तरह सोचते हैं, इसलिए एक आकस्मिक घटना दोनों पक्षों के उल्लंघन में बदल जाती है।
तीसरा कदम टूटन को पक्का कर देता है। दोनों पक्ष ईमानदारी से दूसरे को दोषी मानते हैं, और जाँच करने वाला कोई नहीं होता। स्वतंत्र पर्यवेक्षक के बिना, "पहले किसने शुरू किया" का सवाल आस्था का सवाल बन जाता है और नए सिरे से समझौता करना कठिन हो जाता है।
शांति से किसे नुकसान होता है
दूसरी आम वजह वे लोग हैं, जिन्हें शांति से नुकसान होता है। लगभग हर पक्ष के भीतर ऐसे समूह होते हैं, जिनकी स्थिति लड़ाई जारी रहने पर टिकी होती है, और सब कुछ पहले जैसा करने के लिए उन्हें सिर्फ़ एक घटना चाहिए।
ऐसी घटनाओं के लिए कमान की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं होती। एक छोटा-सा समूह ऐसे समझौते को बिगाड़ सकता है, जिसकी ज़िम्मेदारी बिल्कुल अलग लोगों की होती है। इसी वजह से वार्ताकार समझौते में सिर्फ़ प्रमुख लोगों को नहीं, बल्कि सभी को शामिल करने की कोशिश करते हैं।
तीसरी वजह यह आशंका है कि दूसरा पक्ष इस विराम का इस्तेमाल फिर से संगठित होने के लिए करेगा। जब तक दोनों पक्ष ऐसा सोचते रहते हैं, हर कोई सतर्क रहने की कोशिश करता है और युद्धविराम पहली संदिग्ध हरकत तक ही टिकता है।
टिके रहने वाले युद्धविरामों की खासियत
- लिखा हो कि किसे उल्लंघन माना जाएगा और किसे नहीं।
- घटनाओं को दर्ज करने वाला कोई तीसरा पक्ष हो।
- आकस्मिक घटनाओं की जल्दी जाँच के लिए पक्षों के बीच संपर्क का माध्यम हो।
- उल्लंघन होने पर लड़ाई में लौटने के अलावा क्या किया जाएगा, यह पहले से तय हो।
- समझौते में सिर्फ़ प्रमुख समूहों को नहीं, सभी सशस्त्र समूहों को शामिल किया गया हो।
तीसरी बात छोटी लग सकती है, लेकिन बाकी उपायों से ज़्यादा युद्धविराम इसी से बचते हैं। अगर दोनों पक्ष एक घंटे के भीतर पता लगा सकते हैं कि क्या हुआ, तो आकस्मिक घटना आकस्मिक ही रहती है। संपर्क न होने पर वह अपने-आप उल्लंघन बन जाती है।
प्रथम विश्व युद्ध का मशहूर क्रिसमस युद्धविराम सीधे संपर्क की वजह से टिका रहा: सैनिक एक-दूसरे को सामने देखकर सीधे बातचीत करते थे। वह भीतर से नहीं, बल्कि ऊपर से आए आदेशों के कारण समाप्त हुआ और अगले वर्षों में उसे दोहराने नहीं दिया गया।
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स्रोत
- युद्धविरामों पर हुए शोध बताते हैं कि किसी समझौते की टिकाऊपन जाँच की व्यवस्था, पक्षों के बीच संपर्क के माध्यमों और सभी सशस्त्र समूहों को शामिल करने पर निर्भर करती है, सिर्फ़ पक्षों के इरादों पर नहीं।