शुरुआत में यह साज-सामान का हिस्सा थी
दौड़ते घोड़े पर धनुष चलाने वाले सवार को सहारे की जरूरत होती है। उसका पैर रकाब पर टिका रहना चाहिए और फिसलना नहीं चाहिए, खासकर तब जब वह उठकर अपना धड़ घुमाता है। एड़ी इस समस्या को सबसे सरल तरीके से हल करती है: वह तलवे पर एक टेक लगा देती है।
इसीलिए एड़ी वाले जूते वहीं मिलते हैं, जहां घुड़सवार सेना शक्तिशाली थी। यूरोप में उनका इस्तेमाल तब तक नहीं हुआ, जब तक 17वीं सदी की शुरुआत में वहां फारसी दूतावास नहीं पहुंचे और अपने साथ फारसी तथा सैन्य चीजों का चलन नहीं लाए।
- 16वीं सदीफारसी घुड़सवार सेना में एड़ी: रकाब में पैर के लिए टेक।
- 1600 का दशकयूरोपीय कुलीन वर्ग ने इसे पुरुषों की युद्धप्रिय पोशाक के हिस्से के रूप में अपनाया।
- 1670 का दशकफ्रांसीसी दरबार में ऊंची एड़ी और लाल तलवे हैसियत के प्रतीक बन गए।
- 1780 का दशकपुरुष सजावट छोड़कर सादी, सख्त पोशाक की ओर चले गए। एड़ी महिलाओं के लिए रह गई।
यहां बात सुविधा की नहीं, संदेश की थी। एड़ी चाल को धीमा बनाती है और समतल फर्श की मांग करती है, यानी इसे पहनने वाला न तो काम करता है, न कीचड़ में चलता है। इसी वजह से यह मूल्यवान बनी: यह पैर की ताकत नहीं, पहनने वाले की हैसियत दिखाती थी।
दो अलग-अलग एड़ियां
रकाब में टेक, काठी में स्थिरता, चौड़ी और नीची
कद, मुद्रा, कदमों की आवाज, शारीरिक काम से मुक्ति
इसके बाद एक ऐसा मोड़ आया, जिसे फैशन इतिहासकार पुरुषों का महान त्याग कहते हैं। 18वीं सदी के अंत में पुरुषों की पोशाक अचानक बहुत सादी हो गई: चमकीले रंग, लेस, पाउडर और एड़ियां गायब हो गईं। सादगी गरिमा का नया प्रतीक बनी, जबकि सजावट पूरी तरह महिलाओं की पोशाक का हिस्सा बन गई।
एड़ी सिर्फ महिलाओं के जूतों में बची रही, और बाद में उसके लिए एक नई वजह गढ़ ली गई: पैर की खूबसूरती और चाल पर उसका असर। यह व्याख्या इतनी मजबूती से चल पड़ी कि आज इस चीज की सैन्य उत्पत्ति मनगढ़ंत लगती है।
फिर भी इसके पुराने इस्तेमाल के निशान कहीं गए नहीं हैं। काउबॉय और कोसैक जूतों में आज भी उभरी हुई एड़ी बनाई जाती है, ठीक उसी वजह से: ताकि पैर रकाब में टिका रहे। बस, इन जूतों को कोई फैशनेबल नहीं मानता।
सवार को एड़ी की जरूरत क्यों थी?
समय के साथ एड़ी महिलाओं के जूतों में ही क्यों रह गई?
स्रोत
- वेशभूषा के इतिहासकार एड़ी की उत्पत्ति घुड़सवार सेना के जूतों से और 17वीं सदी की शुरुआत में फारसी दूतावासों के जरिए उसके यूरोप पहुंचने का वर्णन करते हैं
- 18वीं सदी के अंत में पुरुषों द्वारा सजावटी पोशाक छोड़ने को महान पुरुष-त्याग कहा जाता है।
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