पहले क्या माना जाता था
20वीं सदी के मध्य में यह विचार प्रचलित था कि बच्चा उसी से जुड़ता है जो उसे खिलाता है: माना जाता था कि लगाव भोजन की ज़रूरत पूरी होने से पैदा होता है। इसी से यह सलाह भी निकली कि दुलार कम हो और दिनचर्या ज़्यादा।
प्रयोग इस विचार की सीधे जाँच करने के लिए बनाया गया था। खाना केवल कठोर ढाँचे के पास था, जबकि गर्माहट और मुलायमपन केवल दूसरे के पास। अगर खिलाने वाली धारणा सही होती, तो बच्चे पहली को चुनते।
अंतर बहुत बड़ा था। वे तार वाली आकृति के पास सिर्फ खाने के लिए जाते और तुरंत लौट आते। डरने पर बच्चे मुलायम आकृति के पास भागते और उससे चिपककर शांत हो जाते, फिर कमरे को देखने की हिम्मत करते।
बच्चे को सिर्फ खाना ही नहीं, लौटने के लिए एक सुरक्षित ठिकाना भी चाहिए। दुनिया को समझने की क्षमता भी इसी से विकसित होती है।
इससे क्या बदला
यह नतीजा उन संस्थानों में बच्चों के बारे में किए गए अवलोकनों से मेल खाता था, जहाँ खाना खिलाने और साफ-सफाई की व्यवस्था तो अच्छी थी, लेकिन परिचित बड़े मौजूद नहीं थे। इन बच्चों का विकास स्पष्ट रूप से पीछे रह गया था, और इसे केवल पोषण से समझाया नहीं जा सकता था।
इन सभी निष्कर्षों ने देखभाल की व्यवस्था बदल दी: अस्पतालों में माता-पिता को बच्चों के साथ रहने की अनुमति दी जाने लगी, और बाल संस्थानों में हर बच्चे के लिए बारी-बारी से बदलते देखभालकर्ताओं के बजाय एक स्थायी वयस्क देने की कोशिश होने लगी।
इन प्रयोगों के बारे में एक और बात कहना ज़रूरी है। इनमें से कुछ में बच्चों को लंबे समय तक अलग-थलग रखा गया था, और जानवरों पर इसके गंभीर असर हुए। आज ऐसे शोध की अनुमति नहीं दी जाती, और विज्ञान के इतिहास में यह एक अलग विषय है।
इन निष्कर्षों को लागू करने की सीमाएँ याद रखना भी ज़रूरी है। बंदर इंसान नहीं होते, और बाद में बच्चों और माता-पिता के अवलोकनों समेत दूसरे अध्ययनों ने इन निष्कर्षों का समर्थन किया। यह प्रयोग अपने-आप में मानवीय लगाव को साबित नहीं करता।
कमरे को देखने से जुड़ी एक और बात दिलचस्प है। जब मुलायम आकृति हटा दी जाती, तो बच्चे नई चीज़ों को देखना बंद कर देते और एक कोने में जम जाते। उसे वापस लाने पर उनकी जिज्ञासा भी लौट आती, जबकि कमरा खुद नहीं बदला था।
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स्रोत
- 1950-60 के दशकों में कृत्रिम माताओं के साथ किए गए प्रयोगों ने दिखाया कि बच्चे खिलाने के बजाय स्पर्श से मिलने वाला आराम पसंद करते हैं
- इन नतीजों ने लगाव के सिद्धांत और संस्थानों में बच्चों की देखभाल की प्रथाओं को प्रभावित किया।