शक़ बिल्ली पर ही क्यों गया
बिल्ली हज़ारों साल से इंसान के पास रहती आई है, फिर भी कभी काम करने वाला जानवर नहीं बनी। कुत्ता चराता है, पहरा देता है और आवाज़ देने पर आता है। बिल्ली अपनी मर्ज़ी से आती-जाती है, रात में शिकार करती है और उतनी ही मालिक की होती है, जितना वह खुद तय करे। गाँव के लिए वह मददगार नहीं, अपने कामों में लगी एक पड़ोसी थी।
अब उसकी नज़र को भी देखिए। बिल्ली की रेटिना के पीछे एक परावर्तक परत होती है - टैपेटम। रोशनी रेटिना से दो बार गुज़रती है: बिल्ली को आपकी तुलना में लगभग 6 गुना कम रोशनी में काम चल जाता है, और आग के पास उसकी आँखें चमकती हैं। धुंधलके में सबसे पहले काली बिल्ली ही नज़र से ओझल होती है: उसका आकार घुल जाता है, दो चमकती बिंदियाँ रह जाती हैं। वह उसी तरह दिखाई भी देती है - अचानक और बिल्कुल पास।
मध्ययुगीन यूरोप में रात कोई निष्पक्ष समय नहीं थी: अंधेरे को किसी और का इलाका माना जाता था, और उसमें आत्मविश्वास से चलने वाली हर चीज़ को बुरी शक्तियों से जोड़कर समझाया जाता था। अनाज वाले हर घर के आसपास बिल्लियाँ भी घूमती थीं - उस अकेली बूढ़ी औरत के घर के आसपास भी, जिस पर बिल्लियों के बिना भी जादू-टोना करने का शक था।
- रात का जानवर
- चमकती आँखें
- चुड़ैल की अफ़वाह
- अशुभ संकेत
काली बिल्ली चर्च के दस्तावेज़ों में कैसे पहुँची
1233 में पोप ग्रेगरी IX ने जर्मनी को एक पत्र भेजा, "Vox in Rama": इसमें विधर्मियों की एक रस्म का वर्णन था, जिसमें भाग लेने वाले काली बिल्ली को चूमते थे। इससे अक्सर पूरे यूरोप में बिल्लियों के सामूहिक संहार और उसके बाद आई महामारी का अनुमान लगाया जाता है - लेकिन उस पत्र में बिल्लियों को मारने का आदेश नहीं था, और इतिहासकारों को ऐसे किसी अभियान के निशान नहीं मिलते। उसने वास्तव में इतना किया कि "काली बिल्ली - बुरी शक्ति" के संबंध को एक ज़ोरदार आधिकारिक दस्तावेज़ दे दिया।
16वीं-17वीं सदी में चुड़ैलों पर चले मुकदमों ने इसे और मज़बूत किया। अंग्रेज़ी मामलों में आरोपी महिला के पास एक "सहायक" होने की बात मानी जाती थी - ऐसा जानवर जिसके ज़रिए वह कथित तौर पर काम करती थी - और अदालती दस्तावेज़ों में अक्सर बिल्ली का नाम आता था। 18वीं सदी तक ये मुकदमे ख़त्म हो गए, लेकिन अंधविश्वास उनसे अलग होकर ज़िंदा रहा: रास्ता काटे - बुरा संकेत।
लेकिन दूसरे देश में यही बिल्ली बिल्कुल उलटा अर्थ रखती है। ब्रिटेन में रास्ते में काली बिल्ली का आ जाना शुभ माना जाता है, और बंदरगाह वाले शहरों में लोग उसे घर में रखते थे ताकि नाविक समुद्री यात्रा से लौट आए। जापान में काली बिल्ली को मुसीबत का कारण नहीं, उससे बचाने वाली माना जाता है। और जर्मनी की कुछ मान्यताओं में मुलाक़ात नहीं, बल्कि बिल्ली के रास्ता पार करने की दिशा मायने रखती है।
एक ही बिल्ली, बिल्कुल उलटे निष्कर्ष - यानी मामला बिल्ली का नहीं है। यह अंधविश्वास याददाश्त पर टिका है: अगर मुलाक़ात के बाद आपका दिन ख़राब गया, तो आप दोनों बातों को जोड़कर याद रखेंगे। लेकिन उन 100 मौकों को याद रखने की कोई वजह नहीं होती, जब कुछ नहीं हुआ: वहाँ ऐसी कोई घटना नहीं हुई, जिसे याददाश्त पकड़कर रख सके।
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स्रोत
- पोप ग्रेगरी IX का पत्र "Vox in Rama" (1233)
- इंग्लैंड में चुड़ैलों पर चले मुकदमों के इतिहास से जुड़े शोध
- पशु-नेत्रविज्ञान में टैपेटम के वर्णन।