यह कैसा दिखता था
- जुलाईएक महिला सड़क पर नाचना शुरू करती है और लगातार कई दिनों तक नाचती रहती है।
- एक हफ्ते बाददर्जनों शहरवासी उसके साथ जुड़ जाते हैं। नाच बिना संगीत और बिना रुके चलता रहता है।
- अगस्तअधिकारी तय करते हैं कि इसका इलाज नाच जारी रखने में है: वे जगह उपलब्ध कराते हैं और संगीतकारों को काम पर रखते हैं।
- शरद ऋतुयह घटना धीरे-धीरे थम जाती है। अभिलेखों में थकावट से मरने वालों का ज़िक्र मिलता है।
अधिकारियों का फैसला अजीब लगता है, लेकिन वह उस समय की चिकित्सा-समझ पर आधारित था: माना जाता था कि गर्म खून को हरकत के ज़रिए शरीर से बाहर निकलना चाहिए। व्यवहार में इससे यह घटना और लंबी खिंच गई।
यह अकेली घटना नहीं थी: इस इलाके में पिछली सदियों में भी ऐसे ही प्रकोप दर्ज किए गए थे। यानी लोगों के पास ऐसी स्थिति के लिए पहले से एक तैयार सांस्कृतिक ढांचा मौजूद था।
इसके क्या कारण बताए जाते हैं
अनाज में उगने वाली फफूंद से विषाक्तता वाली थ्योरी लोकप्रिय है, लेकिन विवरण से अच्छी तरह मेल नहीं खाती। एरगॉट से विषाक्तता में ऐंठन और रक्तसंचार में रुकावट होती है, जिनके कारण लंबे समय तक तालमेल के साथ नाचना शारीरिक रूप से संभव नहीं होता।
ज़्यादा स्वीकार की जाने वाली थ्योरी चरम तनाव पर सामूहिक प्रतिक्रिया की है। वह साल अकाल से भरा था, शहर बीमारियों और फसल खराब होने से जूझ चुका था, और स्थानीय परंपरा में ऐसे संत पर विश्वास मौजूद था जो बेकाबू नाच भेजता है।
ऐसे ही प्रकोप 20वीं सदी में भी दर्ज किए गए: स्कूल में हंसी के दौरे, कारखानों में सामूहिक बेहोशी और लोगों के समूहों में बिना किसी शारीरिक कारण के दिखने वाले लक्षण। माना जाता है कि तंत्र एक ही है, केवल रूप बदलता है।
यह महत्वपूर्ण है कि इसमें शामिल लोग दिखावा नहीं कर रहे थे। लक्षण उन्हें वास्तविक महसूस होते हैं और कोई व्यक्ति केवल अपनी इच्छा से उन्हें रोक नहीं सकता। इसी वजह से इतिहासकार धोखे या फैशन के आधार पर दी जाने वाली व्याख्याओं को खारिज करते हैं।
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स्रोत
- स्ट्रासबुर्ग में 1518 का यह प्रकोप उस समय के शहर के इतिहास-वृत्तांतों और चिकित्सकीय अभिलेखों में दर्ज है
- इसमें दर्जनों लोगों के शामिल होने और कुछ लोगों की मौत की जानकारी मिलती है। एरगॉट से विषाक्तता वाली थ्योरी एरगॉटिज़्म की चिकित्सकीय तस्वीर से अच्छी तरह मेल नहीं खाती। सबसे आम व्याख्या अकाल, महामारियों और स्थानीय मान्यताओं की पृष्ठभूमि में हुआ सामूहिक मनोवैज्ञानिक रोग है
- 20वीं सदी में भी ऐसे ही मामले दर्ज किए गए।