शब्द उसका मूल बता देता है
सुमेरियन पट्टिकाओं में उधार की कीमत के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द का अर्थ बछड़ा भी था। प्राचीन यूनानी में उधार की कीमत के लिए ऐसा शब्द इस्तेमाल होता था, जिसका अर्थ था "संतान" या "जन्मी हुई चीज़"। अलग-अलग भाषाओं में रूपक एक ही था।
इसकी तर्कसंगति साफ़ है। उधार लिया गया झुंड सचमुच संतान पैदा करता था, जबकि उधार लिया गया अनाज फसल देता था। इसलिए जितना लिया हो उससे ज़्यादा लौटाना किसी आविष्कार जैसा नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से होने वाली बात का सीधा वर्णन लगता था।
यही रूपक ब्याज के ख़िलाफ़ मुख्य तर्क भी बन गया। अगर चांदी अपने-आप कुछ पैदा नहीं कर सकती, तो उसे उधार देने की कीमत कहीं से कुछ निकाल लेने जैसी है। मशहूर यूनानी दार्शनिक का तर्क यही था, और अगले 1,500 साल तक लोग इसे दोहराते रहे।
बाद के प्रतिबंध भी इसी विचार पर आधारित थे। अलग-अलग समय में अलग-अलग परंपराओं ने उधार पर ब्याज लेने को सीमित या प्रतिबंधित किया, और इस काम को स्वतंत्र व्यक्ति के लिए अनुचित माना गया।
प्रतिबंध से कैसे बचते थे
सबसे आम तरीका मुद्रा-विनिमय वाली हुंडी का था। पैसा एक शहर में दिया जाता, दूसरे शहर में और दूसरी मुद्रा में लौटाया जाता, और विनिमय दर का अंतर ही कीमत होता था। औपचारिक रूप से उसे ब्याज नहीं कहा जाता था।
दूसरा तरीका किसी कारोबारी काम में साझेदारी करना था। कर्ज़ देने वाले को समय की कीमत नहीं, बल्कि मुनाफ़े में हिस्सा और जोखिम का एक भाग मिलता था। यह तरीका स्वीकार्य माना जाता था, क्योंकि वह कर्ज़ लेने वाले के साथ संभावित नुकसान भी साझा करता था।
धीरे-धीरे रवैया बदल गया। जब व्यापार को बड़े निवेशों की ज़रूरत पड़ने लगी, तो यह मान लिया गया कि उधार की भी एक कीमत होती है। बहस सिर्फ़ उसकी अधिकतम सीमा पर रह गई, जो आज तक जारी है।
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स्रोत
- ब्याज वाले कर्ज़ के सबसे पुराने प्रमाण मेसोपोटामिया से मिलते हैं और उनका संबंध अनाज तथा पशुधन से है
- सुमेरियन और यूनानी शब्दावली में संतान के रूपक का इस्तेमाल किया गया। ब्याज लेने पर लगे प्रतिबंधों से मुद्रा-विनिमय वाली हुंडी और मुनाफ़ा बांटने के समझौतों के ज़रिए बचा जाता था।