संस्थानों में क्या देखा गया
युद्धकालीन शिशुगृहों और अनाथालयों में बच्चों को खाना दिया जाता था, उनका इलाज होता था और उन्हें साफ रखा जाता था। फिर भी कई बच्चों का वज़न बढ़ना बंद हो गया, खेल में उनकी रुचि कम हो गई और भाषा-विकास में वे पीछे रह गए। जो बच्चे बहुत छोटी उम्र में वहाँ आए और जिनकी देखभाल करने वाले वयस्क बार-बार बदलते रहे, उनकी हालत सबसे खराब थी।
तुलना का नतीजा अप्रत्याशित था। कठिन परिस्थितियों में अपनी माताओं के साथ रहने वाले बच्चे, ऐसे सुव्यवस्थित संस्थान में रहने वाले बच्चों से बेहतर स्थिति में थे जहाँ उनके पास कोई स्थायी वयस्क नहीं था। यानी समस्या न तो पोषण की थी, न स्वच्छता की।
- 1940 का दशकयुद्धकालीन शिशुगृहों और अनाथालयों में अवलोकन: अच्छी देखभाल के बावजूद बच्चे विकास में पीछे रह जाते थे।
- 1951एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के लिए तैयार रिपोर्ट प्रकाशित हुई: स्थायी वयस्क को खोना गंभीर जोखिम माना गया।
- 1950 का दशकअस्पतालों में बच्चों पर बनी फिल्मों ने नियम बदल दिए: माता-पिता को अपने बच्चे से मिलने की अनुमति मिलने लगी।
- 1960 का दशकबिछड़ने और फिर मिलने पर बच्चे के व्यवहार का अवलोकन करने वाले अध्ययन सामने आए। सिद्धांत को परखा जा सकने वाला रूप मिला।
तीसरे निष्कर्ष ने अस्पतालों को बदल दिया। पहले माता-पिता को सप्ताह में 1 घंटे के लिए बच्चे से मिलने दिया जाता था, क्योंकि माना जाता था कि मुलाकात से बच्चा परेशान होता है: उसके बाद वह रोता था। अवलोकन से पता चला कि रोना इस बात का संकेत था कि जुड़ाव कायम है, जबकि शांत हो चुके बच्चे की शांति का मतलब था कि उसने इंतज़ार करना बंद कर दिया है।
सिद्धांत में क्या शामिल हुआ
बाद में इस सिद्धांत को कई बार संशोधित और आलोचित किया गया: शुरुआती रूपों में माँ की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया और पिता, दादी-नानी तथा देखभाल करने वालों को कम महत्व दिया गया। आज का संस्करण किसी खास भूमिका की नहीं, बल्कि एक स्थायी वयस्क की बात करता है।
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स्रोत
- युद्धकालीन शिशुगृहों में बच्चों का अवलोकन अन्ना फ्रॉयड और डोरोथी बर्लिंघम ने किया था
- बिछड़ने का विकास पर प्रभाव संबंधी 1951 की रिपोर्ट जॉन बोल्बी ने तैयार की थी। बाद के शोधों ने स्थायी देखभाल करने वाले वयस्क की भूमिका को और स्पष्ट किया।