यह कैसे काम करती थी
विषयों की सूची। एक सूची होती थी कि किन बातों के बारे में नहीं लिखा जा सकता। वह अक्सर गुप्त होती थी और लेखक अस्वीकृतियों से अंदाजा लगाते थे कि उसमें क्या शामिल है।
छपाई से पहले पढ़ना। पांडुलिपि एक अधिकारी के पास जाती थी। वह उसमें से अंश काट देता, दोबारा लिखने को कहता या पूरी रचना पर रोक लगा देता।
मुहर। अनुमति पर हस्ताक्षर और मुहर के जरिए आधिकारिक पुष्टि की जाती थी। इनके बिना छापेखाने को पाठ छापने का अधिकार नहीं था।
जवाबदेही। जो चीज़ छूट जाती, उसके लिए अधिकारी खुद जिम्मेदार होता था। इसलिए वह एहतियात के तौर पर जरूरत से ज्यादा काट देता था।
चौथा कदम हर सेंसरशिप व्यवस्था की सबसे खास बात समझाता है। कुछ छूट जाने की सजा हमेशा जरूरत से ज्यादा काटने की सजा से कड़ी होती है, इसलिए व्यवस्था अनिवार्य रूप से मामूली और निर्दोष चीज़ों पर भी रोक लगाने की ओर झुक जाती है।
इसी वजह से मौसम के वर्णन, भौगोलिक नाम और बीमारियों के उल्लेख जैसी मशहूर बेतुकी चीज़ें भी काट दी जाती थीं। अधिकारी नहीं समझ पाता था कि कोई बात खतरनाक है या नहीं, इसलिए उसे हटा देता था, क्योंकि सावधानी बरतने पर उसे कभी सजा नहीं मिलती थी।
लेखक क्या करते थे
इसका जवाब लिखने का एक खास तरीका था: अपनी बात इस तरह कहो कि उस पर औपचारिक रूप से आपत्ति करने की कोई गुंजाइश न रहे। कहानी को किसी दूसरे देश या युग में रख दिया जाता, विचार किसी नकारात्मक पात्र के मुंह से कहलवाया जाता या मुख्य बात को फुटनोट अथवा अनुवाद में छिपा दिया जाता।
इस तरीके का एक ऐसा दुष्प्रभाव भी था, जिसका जिक्र कम होता है। पाठक हर जगह दूसरा अर्थ तलाशने के आदी हो जाते थे और वहां भी उसे ढूंढ़ लेते थे, जहां लेखक का ऐसा कोई आशय नहीं होता था।
प्रारूप बदलकर बच निकलने का रास्ता भी था। शोधपरक प्रकाशन, बच्चों की किताब, किसी क्लासिक रचना का अनुवाद या सरकारी संकलन, इन सबकी जांच अलग और अधिक नरमी से होती थी, इसलिए जो सामग्री सामान्य छपाई में पास नहीं हो पाती, वह इनमें जगह बना लेती थी।
लेकिन इस व्यवस्था का सबसे असरदार हिस्सा किसी अधिकारी के बिना ही काम करता था। यह जानते हुए कि क्या काट दिया जाएगा, लेखक उसे शुरू से ही नहीं लिखता था, और इस तरह का आंतरिक संपादन किसी भी अभिलेखागार में कोई निशान नहीं छोड़ता।
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स्रोत
- प्रकाशन-पूर्व सेंसरशिप प्रतिबंधित विषयों की सूचियों और छूटी हुई सामग्री के लिए सेंसर की व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर आधारित थी, जिससे फैसले रोक लगाने की ओर झुकते थे
- लेखक संकेतों और रूपकों का सहारा लेकर तथा अधिक नरम जांच वाले प्रारूपों में चले जाकर इसका जवाब देते थे, जबकि इसका सबसे व्यापक प्रभाव लेखकों का आत्म-सेंसरशिप करना माना जाता है।