इसे साबित करना मुश्किल क्यों है
दूसरा बिंदु एक आम रणनीति समझाता है। जो गवाह सच नहीं बताना चाहता, वह आम तौर पर सीधे झूठ नहीं बोलता, बल्कि टालमटोल करके जवाब देता है। तकनीकी रूप से उसने कुछ भी निश्चित नहीं कहा होता, इसलिए उस पर कार्रवाई करने की लगभग कोई वजह नहीं बनती।
चौथा बिंदु ऐसे मामलों को महँगा बना देता है। अभियोजक के लिए मूल अपराध पर काम करना, गवाही को अलग से झूठ साबित करने की तुलना में आसान होता है। इसलिए आरोप आम तौर पर चर्चित मामलों में या तब लगाए जाते हैं, जब दस्तावेज़ झूठ को साफ़ दिखाते हों।
फिर शपथ क्यों ली जाती है
शपथ सज़ा के डर से नहीं, बल्कि शब्दों को प्रतिबद्धता में बदलकर असर करती है। ज़्यादातर लोग कानून से डरने की वजह से सच नहीं बोलते, बल्कि इसलिए बोलते हैं क्योंकि उन्होंने ज़ोर से और सबके सामने वादा किया होता है।
अदालत के बाहर किए गए प्रयोग भी इसकी पुष्टि करते हैं। फ़ॉर्म में हस्ताक्षर अंत में करने के बजाय शुरुआत में करने पर लोग कम झूठ बोलते हैं, और ईमानदार रहने के वादे की याद दिलाने के बाद अपनी कामयाबी का श्रेय खुद को कम देते हैं। प्रतिबद्धता अपने आप असर डालती है।
फिर भी सज़ा आख़िरी उपाय के रूप में महत्वपूर्ण रहती है। इसका इस्तेमाल कम होता है, लेकिन इसका होना एक सीमा तय करता है और पर्याप्त सबूत मिलने पर भूल को जान-बूझकर किए गए धोखे से अलग करना संभव बनाता है।
एक अलग अपराध भी है, जिसका इस्तेमाल ज़्यादा होता है: अदालत की अवमानना, जवाब देने से इनकार या अदालत में उपस्थित न होना। इन उल्लंघनों को साबित करना आसान होता है, इसलिए असहयोगी गवाह पर दबाव आम तौर पर इन्हीं के ज़रिए डाला जाता है।
कम कार्रवाई का एक दूसरा पहलू भी है। गवाह जानते हैं कि अस्पष्ट जवाबों पर लगभग कुछ नहीं होगा, और इससे कुल मिलाकर गवाही की उपयोगिता घट जाती है। इसलिए कुछ देश सज़ा को नहीं, बल्कि प्रक्रिया को मज़बूत करते हैं: पूछताछ की वीडियो रिकॉर्डिंग और दस्तावेज़ों से उसका मिलान।
झूठी गवाही देने पर लोगों को कम ही सज़ा क्यों मिलती है?
शपथ मुख्य रूप से कैसे असर करती है?
स्रोत
- जान-बूझकर झूठी गवाही देने पर जेल की सज़ा हो सकती है, लेकिन इसे साबित करने के लिए इरादा साबित करना ज़रूरी है
- अध्ययनों से पता चलता है कि किसी प्रतिबद्धता की याद दिलाना अपने आप धोखे की आवृत्ति घटाता है।
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