पिरामिड की बनावट
कुछ हज़ार अधिकारियों के सहारे इतने बड़े भू-भाग पर सीधे शासन करना संभव नहीं होता। इसलिए बिचौलियों की ज़रूरत पड़ती है: ऐसे लोग, जो कर वसूलें, सैनिक भर्ती करें और स्थानीय स्तर पर व्यवस्था संभालें।
- केंद्रीय सत्ता: छोटा प्रशासन
- बिचौलिया समूह: पद, स्कूल, विशेषाधिकार
- बाकी लोग: कर और काम, ऊपर तक पहुँच नहीं
इसके बाद व्यवस्था अपने-आप चलती रहती है। बिचौलिया अपने पद से चिपका रहता है, क्योंकि सत्ता जाने के साथ उसका सब कुछ चला जाता है; बाकी लोग दोषी बिचौलिए को मानते हैं, क्योंकि कर वसूलने वही आता है और वही उनके तथा निर्णय लेने वालों के बीच खड़ा होता है।
मुख्य कदम इस अंतर को लिखित रूप में पक्का करना है। जब तक किसी समूह से जुड़ाव बदलता रह सकता है, तब तक बँटवारा धुंधला रहता है। जैसे ही यह किसी दस्तावेज़, जनगणना या अलग मतदाता सूची में दर्ज हो जाता है, सीमा कठोर और विरासत में मिलने वाली बन जाती है।
यह कैसा दिखता था
- अलग निर्वाचन मंडल20वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश भारत में धर्म के आधार पर अलग मतदाता सूचियाँ शुरू की गईं: अब लोग केवल अपने ही समूह के लोगों को वोट दे सकते थे।
- दस्तावेज़ में पहचानअंतरराष्ट्रीय अधिदेश के अधीन रवांडा में समूह से जुड़ाव को पहचान-पत्रों में दर्ज कर दिया गया, जिससे पहले बदलता रहने वाला बँटवारा जीवनभर और वंशानुगत बन गया।
- सेना में भर्तीऔपनिवेशिक अधिकारियों ने मुख्यतः कुछ ही समुदायों से सैनिक भर्ती किए, उन्हें ‘योद्धा प्रवृत्ति वाले’ बताया और दूसरे समुदायों के बीच तैनात किया।
सभी मामलों में एक बात समान थी: अंतर पहले से मौजूद थे, लेकिन कठोर नहीं थे। प्रशासनिक मशीनरी ने उन्हें अलग-अलग अधिकारों वाली श्रेणियों में बदल दिया और इस तरह उन्हें वास्तविक बना दिया।
सबसे मुश्किल दौर केंद्रीय सत्ताओं के जाने के बाद शुरू हुआ। राज्य उस समूह के हाथ में आया, जिसे दशकों तक ऊपर या, इसके उलट, नीचे रखा गया था, और सत्ता का संघर्ष तुरंत इस सवाल का संघर्ष बन गया कि यहाँ अपना कौन है।
यह तरीका उपनिवेशों के बाद भी चलता रहा। यही ढाँचा वहाँ काम करता है जहाँ साझा समस्या वाले लोग एक-दूसरे को दोषी मानें तो किसी का फायदा हो: पड़ोसी विभाग, बाहर से आए लोग, अगली पीढ़ी - बस वे लोग नहीं, जो संसाधनों का बँटवारा करते हैं।
‘फूट डालो और राज करो’ तरीके का सार क्या है?
बँटवारे को सबसे टिकाऊ किस कदम ने बनाया?
स्रोत
- उपनिवेशवाद के इतिहासकार प्रशासन के किसी चुने हुए बिचौलिया समूह पर निर्भरता और जनगणनाओं तथा दस्तावेज़ों में जातीय और धार्मिक श्रेणियों को पक्का करने को शासन की आम प्रक्रियाओं के रूप में बताते हैं। ब्रिटिश भारत में धर्म के आधार पर अलग मतदाता सूचियाँ 1909 में शुरू की गईं
- अंतरराष्ट्रीय अधिदेश के अधीन रवांडा में पहचान-पत्रों पर समूह से जुड़ाव दर्ज करने की शुरुआत 1930 के दशक में हुई। ऐसी प्रक्रियाओं और बाद के संघर्षों के बीच संबंध पर शोध साहित्य में चर्चा की गई है।
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