साँप को देखकर इंसान ने क्या देखा
साँप इंसान की आँखों के सामने वह करता है, जो आसपास कोई और नहीं करता। वह अपनी पुरानी केंचुली से बाहर निकलता है और उसे पूरी की पूरी छोड़ देता है, एक खाली, पारदर्शी-सी खोल, जिस पर शल्क और आँखों की छाप होती है। जानवर सामने ज़िंदा है, जबकि उसका पुराना खोल अलग पड़ा है, जैसे कोई छोड़ा हुआ शरीर। इसका अर्थ साफ़ है: वह मर गया और नए रूप में लौट आया।
दूसरा अवलोकन जगह से जुड़ा है। साँप बिल, दरार या पत्थर के नीचे ग़ायब हो जाता है: वह ज़मीन के भीतर चला जाता है, वहीं जहाँ मुर्दे जाते हैं, और वहाँ से ज़िंदा लौट आता है। यूनानियों के लिए भूमिगत दुनिया और मृतकों की दुनिया एक ही क्षेत्र थीं, और साँप उसमें दोनों दिशाओं में आता-जाता था, जो इंसानों के लिए संभव नहीं।
तीसरा अवलोकन ज़्यादा कठोर है। साँप का काटना जल्दी मार देता है, लेकिन उसी पदार्थ की थोड़ी मात्रा नहीं मारती। पुरानी चिकित्सा का बहुत कुछ इसी पर टिका था, जब ज़हरीली चीज़ों से दवाएँ बनाई जाती थीं। प्राचीन यूनानी भाषा में इसके लिए एक ही शब्द था: फर्माकॉन, यानी ज़हर, दवा और औषधि, तीनों एक साथ। इसी से "टॉक्सिक" शब्द भी आया: टॉक्सिकॉन का अर्थ था "धनुष से जुड़ा", टॉक्सॉन यानी "धनुष" से, उस ज़हर के लिए जिससे तीरों पर लेप किया जाता था।
- अर्थ: मौत और इलाज एक हैं
- शब्द: फर्माकॉन, ज़हर और दवा
- अनुभव: मात्रा मारती या ठीक करती है
- अवलोकन: केंचुली उतारता, ज़मीन में रहता
चिकित्सा-चिह्न पर साँप कहाँ से आया
इलाज करने वाला साँप कोई रूपक नहीं, बल्कि एक वास्तविक धार्मिक पंथ का हिस्सा था। एस्क्लेपियस के मंदिरों में, जिनमें एपिडॉरस का मंदिर सबसे प्रसिद्ध था, बीमार लोग एक खास कक्ष में रात बिताते और ऐसे सपने का इंतज़ार करते थे, जिसे वे उपचारकारी मानते थे। मंदिर में रखे गए गैर-विषैले धामिन साँप फ़र्श पर खुलेआम रेंगते थे: साँप का छूना इस संकेत के रूप में देखा जाता था कि देवता आए हैं। एक साँप से लिपटा हुआ दंड वहीं से आया है।
बाद में यह प्रतीक फैलता गया, और अब तीन अलग-अलग साँपों को आपस में मिला दिया जाता है।
अब ज़हर की बात। प्राचीन धारणा कि ज़हर और दवा आपस में जुड़े हैं, अक्षरशः सही निकली, हालाँकि उस समय इसे जाँचने का कोई तरीका नहीं था। साँप के काटने की प्रतिविष-सीरम उसी ज़हर से बनती है: उसकी थोड़ी-थोड़ी मात्रा किसी जानवर में डाली जाती है और उसके खून से प्रतिरक्षी निकाले जाते हैं। 1970 के दशक में ब्राज़ीलियाई जराराका साँप के ज़हर में मौजूद पेप्टाइड्स से ऐसा पदार्थ बनाया गया, जिससे रक्तचाप की दवाओं का एक पूरा वर्ग शुरू हुआ। जो चीज़ रक्तचाप को जानलेवा स्तर तक गिराती है, सही मात्रा में वही उसे सामान्य स्तर तक गिरा देती है।
साँप दोअर्थी नहीं है, मात्रा है। इस प्रतीक ने वह बात सँभालकर रखी, जिसे लोग औषधिविज्ञान से बहुत पहले समझ गए थे: जो चीज़ मारती है, वही अक्सर ठीक भी करती है; फ़र्क सिर्फ़ मात्रा का है।
साँप मौत और नए जीवन, दोनों का प्रतीक क्यों बना?
एस्क्लेपियस के दंड और कैड्यूसियस में फ़र्क कैसे करें?
स्रोत
- प्राचीन धर्म पर किए गए शोधों, एपिडॉरस में एस्क्लेपियस-पंथ और मंदिर में उपचारकारी नींद, यूनानी व्युत्पत्तिमूलक शब्दकोशों तथा Bothrops jararaca के ज़हर से एसीई इनहिबिटर के इतिहास पर आधारित।
“प्रतीक” सीरीज़ में आगे
साइट पर 1 पूरा लेख, ऐप में 1 और
