आदान-प्रदान दोनों दिशाओं में होता है
सोफ़े पर बैठने पर कपड़ों के रेशे और बाल छोड़ती हैं, जबकि सोफ़े की गद्दी के रेशे अपने साथ ले जाती हैं। ज़मीन पर चलने पर जूते का निशान छोड़ती हैं और मिट्टी के कण साथ ले जाती हैं। कोई चीज़ उठाने पर त्वचा के कण छोड़ती हैं और पेंट या धातु के सूक्ष्म कण साथ ले जाती हैं।
पदार्थ के आदान-प्रदान के बिना कोई संपर्क नहीं होता। बस कभी-कभी निशान ढूँढ़ा नहीं जा पाता या उसका सही अर्थ नहीं समझा जाता।
यह नियम एक फ़्रांसीसी फॉरेंसिक विशेषज्ञ ने 100 साल से भी पहले बनाया था और तब से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ। बदली है तो सिर्फ़ उपकरणों की संवेदनशीलता: जो पहले केवल सैद्धांतिक था, अब सचमुच पाया जा सकता है।
इसीलिए फॉरेंसिक जाँचकर्ता केवल साफ़ दिखाई देने वाली चीज़ें ही नहीं जुटाते। वे कालीन को वैक्यूम करते हैं, सोफ़े की गद्दी के नमूने काटते हैं, चिपकने वाली टेप से रेशे उठाते हैं और जूतों से मिट्टी के नमूने लेते हैं। इनमें से कोई भी चीज़ अपने-आप में कुछ साबित नहीं करती; दूसरी जगह से मिले साक्ष्यों से तुलना करने पर ही उनका अर्थ निकलता है।
निशान और साक्ष्य में क्या अंतर है
किसी व्यक्ति का कण मिल गया, तो वह घटनास्थल पर ज़रूर रहा होगा।
पदार्थ बीच के माध्यमों से भी पहुँच सकता है: हाथ मिलाने, एक ही दरवाज़े का हैंडल छूने या किसी और के कपड़ों के ज़रिए। इस तरह का स्थानांतरण प्रयोगों से साबित हो चुका है, और अकेले मिला कोई कण यह नहीं बताता कि वह वहाँ कैसे पहुँचा।
दूसरे माध्यम से स्थानांतरण की संभावना आधुनिक फॉरेंसिक जाँच की सबसे बड़ी चुनौती है। विधियाँ इतनी संवेदनशील हो गई हैं कि एक-एक कोशिका से मिले निशान भी पाए जा सकते हैं। इसलिए यह सवाल कि ऐसा निशान वहाँ पहुँचा कैसे, उसके मिल जाने के तथ्य से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
इससे एक नियम निकलता है: अकेला निशान लगभग कभी भी मामला तय नहीं करता। मायने रखता है कई चीज़ों का मेल - अलग-अलग प्रकार के कई निशान, जो एक-दूसरे से मेल खाते हों, और यह व्याख्या कि उनमें से हर एक वहाँ कैसे पहुँच सकता था।
दूसरा पहलू
यह सिद्धांत बचाव के पक्ष में भी काम कर सकता है। अपेक्षित निशानों का न मिलना भी जानकारी है: अगर कोई व्यक्ति कमरे में कथित तौर पर संघर्ष कर रहा था, तो उस व्यक्ति और कमरे, दोनों पर एक-दूसरे से जुड़े निशान होने चाहिए। उनका न होना भी उतनी ही व्याख्या माँगता है, जितना उनका होना।
इस सिद्धांत की सीमाएँ समझना भी ज़रूरी है। यह कहता है कि आदान-प्रदान हुआ था, यह नहीं कि निशान बचा भी रहा। रेशे झड़ जाते हैं, त्वचा घिस जाती है और बारिश मिट्टी बहा ले जाती है। इसलिए घटना और जाँच के बीच का समय उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी जाँच की सावधानी।
फॉरेंसिक विज्ञान का मूल सिद्धांत क्या कहता है?
किसी व्यक्ति का कण मिलना उसकी मौजूदगी क्यों साबित नहीं करता?
स्रोत
- संपर्क के दौरान पदार्थ के पारस्परिक आदान-प्रदान का सिद्धांत 20वीं सदी की शुरुआत में एडमंड लोकार्ड ने बनाया था। जैविक पदार्थ के दूसरे माध्यम से स्थानांतरण की संभावना प्रयोगों से साबित हो चुकी है।
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