यह कैसे किया जाता था
चयन बाहरी रूप-रंग के आधार पर होता था: खोपड़ी की माप ली जाती, आंखों और बालों का रंग देखा जाता और तालिकाओं के आधार पर मूल्यांकन किया जाता। उपयुक्त माने गए बच्चों को परिवारों, अनाथालयों और जबरन मज़दूरी के लिए ले जाए गए माता-पिता से छीन लिया जाता था। उनकी सहमति की ज़रूरत नहीं होती थी।
- जांच और चयन
- शिविर ले जाना
- नाम बदलना
- पालक परिवार
तीसरा कदम सबसे महत्वपूर्ण था। बच्चे को जर्मन नाम दिया जाता, जन्म से जुड़े दस्तावेज़ जाली बनाए जाते और अपनी मातृभाषा बोलने पर रोक होती। छोटे बच्चों को जल्दी ढाल लिया जाता, जबकि बड़े बच्चों को हर शब्द के लिए सज़ा दी जाती। एक-दो साल में कई बच्चे अपनी पिछली ज़िंदगी याद रखना बंद कर देते थे।
पालक परिवारों को आमतौर पर कुछ भी पता नहीं होता था: उन्हें बताया जाता था कि ये जर्मन बस्तियों के अनाथ बच्चे हैं। कई परिवारों ने उन्हें अपने बच्चों की तरह पाला, और युद्ध के बाद इन्हीं परिवारों ने उन्हें लौटाने का सबसे ज़ोरदार विरोध किया।
उनका पता क्यों नहीं चला
दस्तावेज़ जान-बूझकर नष्ट किए जाते थे, और जो बच गए थे वे अलग-अलग इलाकों में बिखरे हुए थे। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं बच्चों की तलाश कर रही थीं और उनके पास केवल अधूरी जानकारियां थीं: पहचान के निशान, उम्र और बची हुई कुछ नाम-सूचियां।
- बच्चे की असली पहचान से जुड़े कागज़ जाली बना दिए गए या नष्ट कर दिए गए।
- बच्चे को अपना असली नाम और भाषा याद नहीं थी।
- माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी या उन्हें खुद पता नहीं था कि बच्चे को कहां ले जाया गया।
- पालक परिवार खुद को दोषी नहीं मानता था और बच्चे से अलग नहीं होना चाहता था।
- साल बीत चुके थे और दूसरी बार स्थान बदलना बच्चे की ज़िंदगी फिर से तहस-नहस कर देता।
आखिरी दो बातों ने तलाश को सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं रहने दिया। कई साल बाद बच्चे को लौटाने का मतलब था उसे उन लोगों से छीनना, जिन्हें वह अपने माता-पिता मानता था, और उन लोगों के पास वापस भेजना, जिन्हें वह याद भी नहीं करता था। फैसले अलग-अलग तरह से लिए गए और अक्सर बेहद पीड़ादायक थे।
ले जाए गए बच्चों की कुल संख्या का अब भी केवल अनुमान लगाया जाता है और अनुमानों में बहुत बड़ा अंतर है। लौटाए जा सके बच्चों की संख्या कम थी, और कई लोगों को अपने बारे में सच्चाई वयस्क होने के बाद ही संयोग से दस्तावेज़ों या रिश्तेदारों की बातों से पता चली।
एक और कठिनाई यह थी कि तलाश के समय तक कई बच्चे केवल जर्मन बोलते थे। उनकी बोली या उनकी बताई कहानी से उनकी पहचान नहीं की जा सकती थी, इसलिए मिलान के लिए केवल बाहरी निशान और अधूरे दस्तावेज़ ही बचे थे।
इस कार्यक्रम में कौन-सा कदम सबसे महत्वपूर्ण था?
युद्ध के बाद केवल कुछ बच्चों का ही पता क्यों चला?
स्रोत
- कब्ज़े वाले इलाकों से बच्चों को ले जाने और उन्हें जर्मन बनाने का कार्यक्रम युद्ध के बाद हुई सुनवाइयों के दस्तावेज़ों में दर्ज है
- ले जाए गए बच्चों की सही संख्या अज्ञात है और केवल कुछ ही लौटाए जा सके।
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